दंतेवाड़ा :- माई दंतेश्वरी के दरबार में सदियों पुरानी आस्था का निर्वहन, रक्षाबंधन से पहले मां को अर्पित हुई विशेष राखी


करीब 800 वर्षों से चली आ रही अनूठी परंपरा आज भी कायम, मां के आशीर्वाद के बाद ही बस्तर में शुरू होता है रक्षाबंधन का पर्व।

*जिला दंतेवाड़ा*

बुराल्ली रामू (रामबाबू) की रिपोर्ट*

दंतेवाड़ा। बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के दरबार में रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ निभाई गई। रियासतकाल से चली आ रही इस अनूठी परंपरा के तहत कच्चे धागे से तैयार विशेष रक्षासूत्र मां दंतेश्वरी को अर्पित किया गया। मान्यता है कि बस्तर में किसी भी बड़े पर्व, तीज-त्योहार या शुभ कार्य की शुरुआत मां दंतेश्वरी की आज्ञा और आशीर्वाद के बाद ही होती है।

कच्चे धागे से तैयार होती है मां के लिए विशेष राखी

रक्षाबंधन से एक दिन पहले सेवादारों द्वारा हल्दी, कुमकुम और चंदन से पूजन कर कच्चे धागे से विशेष रक्षासूत्र तैयार किया गया। रक्षासूत्र को बांस से निर्मित टोकरी में रखकर मंदिर से जुड़े सेवादार, मांझी, भंडारी, राउत और टुड़पा गाजे-बाजे के साथ नारायण मंदिर के समीप स्थित शीतला सरोवर पहुंचे।
शीतला सरोवर में रक्षासूत्र को जल में डुबोकर शुद्ध किया गया। इसके बाद गुड़, पुष्प, चंदन और कुमकुम अर्पित कर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई। पूजा संपन्न होने के बाद रक्षासूत्र को वापस मां दंतेश्वरी मंदिर लाकर कलश स्थापना कक्ष में विधिवत रखा गया।

मां को राखी बांधकर लिया आशीर्वाद

रक्षाबंधन से एक दिन पूर्व शाम करीब 6 बजे मंदिर के प्रधान पुजारी द्वारा विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद कच्चे धागे से तैयार विशेष राखी मां दंतेश्वरी को अर्पित की गई। मां को रक्षासूत्र अर्पित करने के पश्चात मंदिर में विराजमान अन्य देवी-देवताओं को भी रक्षासूत्र बांधने की परंपरा निभाई गई।
इसके बाद मंदिर के पुजारी और सेवादारों ने मां के प्रसाद स्वरूप रक्षासूत्र को एक-दूसरे की कलाइयों पर बांधा और सुख-समृद्धि, शांति एवं मंगल की कामना की।

करीब 800 वर्षों से जीवंत है परंपरा

मंदिर के पुजारी शंभू नाथ के अनुसार, मां दंतेश्वरी को रक्षाबंधन से एक दिन पहले रक्षासूत्र अर्पित करने की परंपरा नई नहीं, बल्कि रियासतकाल से चली आ रही है। मान्यता है कि बस्तर में किसी भी तीज-त्योहार या पर्व का शुभारंभ सबसे पहले मां दंतेश्वरी मंदिर में परंपरागत पूजा-अर्चना के साथ होता है। मंदिर में पर्व की रस्म पूरी होने के बाद ही क्षेत्र की जनता उस पर्व को मनाती है।
बताया जाता है कि मां दंतेश्वरी को विशेष रक्षासूत्र अर्पित करने की यह परंपरा करीब 800 वर्षों से चली आ रही है। बदलते दौर और आधुनिकता के बावजूद दंतेश्वरी मंदिर में यह प्राचीन परंपरा आज भी उसी श्रद्धा, विश्वास और विधि-विधान के साथ निभाई जा रही है।

52 शक्तिपीठों में एक है मां दंतेश्वरी का दरबार

मां दंतेश्वरी को बस्तर की आराध्य देवी माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार दंतेश्वरी शक्तिपीठ 52 शक्तिपीठों में से एक है। बस्तर की सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में मां दंतेश्वरी का विशेष स्थान है। यहां किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ अथवा बड़े पर्व से पहले मां की अनुमति और आशीर्वाद लेने की परंपरा रही है।
मां दंतेश्वरी को अर्पित की गई यह विशेष राखी केवल एक धार्मिक रस्म नहीं, बल्कि बस्तर की सदियों पुरानी आस्था, संस्कृति, परंपरा और ऐतिहासिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यही वजह है कि रक्षाबंधन से पहले मां के दरबार में निभाई जाने वाली यह परंपरा आज भी श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण और आस्था का केंद्र बनी हुई है।

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